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Ballia : पूर्वांचल की तीन लोस सीटों पर भूमिहारों का रहा दबदबा

रोशन जायसवाल
आगामी लोकसभा चुनाव में किन लोकसभाओं में भूमिहार बिरादरी के प्रत्याशियों का क्या माहौल बनेगा यह वक्त की बात होगी, लेकिन बलिया, घोसी व गाजीपुर में भूमिहार प्रत्याशियों का जबरजस्त जलवा रहा है। पूर्वांचल के तीन लोकसभा सीटों पर 19 बार भूमिहार जीतें। अकेले घोसी में 12 बार भूमिहार प्रत्याशी लोकसभा में पहुंचते रहे। पूर्वांचल के सियासत में भूमिहार बिरादरी के तीन सीटों पर जबरजस्त पैठ है। इन तीन सीटों में घोसी, गाजीपुर और वाराणसी में अब तक हुए चुनाव में 19 बार लोकसभ सीट भूमिहार बिरादरी के झोली में रहा। भले ही बलिया में भूमिहार बिरादरी के प्रत्याशी को जीत नहीं मिली हो लेकिन गाजीपुर और घोसी में भूमिहार प्रत्याशी चुनाव जीत कर दिल्ली के सदन में पहुंचते रहे है। पूर्वांचल के महत्वपूर्ण सीट वाराणसी पर भूमिहार वोटर हार जीत तय करते रहे है। अगर पूर्वांचल के 13 लोकसभा सीटों पर नजर डाले तो भूमिहार वोटरों की संख्या भी ठीक ठाक है। बलिया लोकसभा क्षेत्र में लगभग डेढ़ लाख भूमिहार मतदाता है। आजमगढ़ में करीब एक लाख भूमिहार वोटर है। वाराणसी और घोसी में भूमिहार मतदाताओं की संख्या लगभग 80 हजार है। गाजीपुर में 70 हजार भूमिहार मतदाता है। वहीं मऊ जिले के घोसी लोकसभा क्षेत्र में सबसे अधिक दलित है। इस सीट पर 17 में 12 बार भूमिहार बिरादरी के नेता सांसद चुने गये। वाराणसी में 2 सांसद रघुनाथ ंसिंह और सत्यनारायण सिंह भूमिहार वर्ग से थे। भदोही, मिर्जापुर और चंदौली ऐसी लोकसभा सीट है जहां से इस बिरादरी का एक भी नेता आज तक नहीं जीता। 2009 में बलिया से भी मनोज सिन्हा चुनाव लड़े उनको जीत नहीं मिली, जबकि बलिया में लगभग डेढ़ लाख भूमिहार वोटर है। आजमगढ़ के साथ भी ऐसा ही हुआ। बाबू विश्राम राय इस सीट से तीन बार चुनाव लड़े मगर जीत दर्ज नहीं करा सके।
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घोसी लोकसभा सीट से चार बार कल्पनाथ राय को मिली थी कामयाबी

घोसी सीट पर देश के माने जाने नेता कल्पनाथ राय सर्वाधिक 4 बार सांसद चुने गये। उनके निधन के बाद भूमिहार राजनीत 20 वर्ष तक हासिए पर रही। 2019’ के चुनाव में सपा, बसपा के गठबंधन में भूमिहार चेहरे के रूप में अतुल राय ने जीत दर्ज करायी। 1957 के दूसरी लोकसभा चुनाव में गैर भूमिहार उमराव सिंह सांसद बने, लेकिन फिर 1962, 1967, 1968, 1972, 1977, 1980, 1984, 1989, 1991, 1996 और 1998 के चुनाव में हर बार भूमिहार बिरादरी का ही दबदबा रहा। 1962 और 1967 में घोसी सीट से भूमिहार नेता जय बहादुर सिंह विजयी हुए।

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