Ballia : … … जब अंग्रेजों ने छात्रों केे हुजूम पर दौड़ा दिये थे घोड़े

आजादी के दीवानों के बलिदान की बदौलत हमें मिली है आजादी
रामचंद्र की कलम से…
बलिया।
सर्वप्रथम मैं पूरे जनपद वासियों एवं समस्त देशवासियों को 15 अगस्त 1947 की हार्दिक शुभकामनाएं दे रहा हूं। आज आजादी के 76वें वर्ष पूरे होने को है यह आजादी हमें यूं ही इतनी आसानी से नहीं मिली है। इसके लिये हमारे वीर क्रांतिकारियांे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, वीरागंनाओं द्वारा बड़े कष्ट उठाकर, बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दी है। हमें अपने पूर्वजों पर नाज है। भारत को गुलामी से मुक्ति की पहली अलख हमारे ग्राम नगवां जिला बलियाा की धरती पर जन्मंे महान सेनानी मंगल पांडेय, सन 1857 में अंग्रेज को गोली मारकर किया। इसी कड़ी में आठ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी की अध्यक्षता में बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में भारत छोड़ों आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया, भारत छोड़ों आंदोलन देश का सबसे बड़ा क्रांतिकारी आंदोलन था। जिसकी वजह से अंग्रेज भारत छोड़ने के लिये विवश हो गये थे। आठ अगस्त को ही महात्मा गांधी ने लोगों से आह्वान किया कि भारत छोड़ों आंदोलन आजादी के लिये आखिरी बड़ा आंदोलन है। गांधी जी ने करो या मरो का नारा दिया था। गांधी जी ने लोगों से अनुरोध किया कि आजदी मिल जाए या जान दे दी जाए इससे कम कुछ नहीं, हालांकि गांधी जी अहिंसा के पुजारी थे किंतु उन्होंन इस आंदोलन को हिंसा के लिय मौन समर्थन दे दिया। गांधी जी ने बम्बई अधिवेशन में कहा कि अंग्रेज भारत छोड़ों आंदोलन में बड़े नेताओं की गिरफ्तारियां हो सकती है इसलिये मेरे भारतवासियों आप निराश व हताश मत होना इस लड़ाई में प्रत्येक भारतीय अपने आप को नेता समझे, जैसी आशंका थी वहीं हुआ नौ अगस्त 1942 की सुबह महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, अब्दुल कलाम आजाद आदि बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर अलग-अलग जेलों में डाल दिया गया। गांधी जी का यह संदेश रेडियो अपना आंचलिक समाचार पत्र के माध्यम से बलिया के लोगों को पता चली तो यहां की जनता आबग बबूला हो गयी। इधर जयप्रकाश नारायण को हजारी बाग जेल में बंद कर दिया गया। बलिया शहर निवासी उमाशंकर सोनार तथ सूरज प्रसाद ने पूरे बलिया मं प्रचार प्रसार किया।

टाउन हाल बलिया में चित्तू पांडेय के नेतृत्व में मीटिंग हुई। 10 अगस्त को पूरे शहर मं जुलूस निकाला गया। 12 अगस्त को बैरिया और बलिया में जुलूस निकाला गया। 13 अगस्त को बनारस ट्रेन से आये छात्रों का हुजूम देखकर लागों मंे जोश भर गया। 14 अगस्त को मिडिल स्कूल सिकंदरपुर में थानेदार ने छात्रों पर घोड़ा दौड़ दिया। चितबड़ागांव, ताजपुर डेहमा, फेफना, रसड़ा, सहतवार, सुरेमनपुर बैरिया, बिल्थरारोड में रेल पटरियों को उखा़ड़ फेंका गया। रेल मार्ग पूरी तरह से ठप हो गया था। 16 अगस्त को खोरीपाकड़ के दुखी कोईरी ने शहर कोतवाल और परगना अधिकारी को उठाकर पटक दिया था। गुदरी बाजार में दुखी कोईरी सहित सात लोग शहीद हो गये। ये सभी निम्न वर्ग से थे, जिसमंे रामसुभाग भी थे। 17 अगस्त को रसड़ा में चार लोग शहीद हुए, 18 अगस्त को बैरिया मं कौशल कुमार सहित 18 लोग शहीद हुए। हजारों लोगों को जेल में बंद कर दिया गया। 19 अगस्त को सशस्त्र जुलूस निकला। जिसमें अंग्रेजों के खिलाफ लोगों में नफरत एवं गुस्सा था। लोग गांव-गांव से अपने हाथों में लाठी, डंडा, भाला यहां तक कि सांप, बिच्छू, गोजर, चूहा आदि लेकर सड़कों पर उतर गये। सरकारी कार्यालयों को लूटा व फूंका जाने लगा। डाक तार व रेल पटरियों को उखाड़ फेंका गया। पूरा बलिया आग में जल रहा था। 10 थानों की पुलिस निष्क्रिय हो गयी। जनता जिला कारागार को घेर ली। ओक्डेनगंज निवासी जानकी देवी महिलाओं का नेतृत्व करते हुए जिला जज के कार्यालय में घुस गयी और जज को चूड़ियां भेट करते ही जिला कार्यालय छोड़कर भाग गये। जानकी देवी जजी में तिरंगा फहरा दिया। इसके बाद जानकी देवी का जुलूस तहसील की ओर बढ़ा और वहां परगना अधिकारी को चूडियां भेंट करते ही एसडीएम भी भाग गये। जानकी देवी एसडीएम की कुर्सी पर बैठ गयी। जिला कारागार को घेरे जन सैलाब को देखकर जिला प्रशासन एंव पुलिस प्रशासन असहाय हो गया। डीएम एवं एसपी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। आनन-फानन में बलिया के तत्कालीन डीएम जगदीश नारायण निगम और एसपी जियाउद्दीन खां जिला कारागार में बंद स्वतंत्रता सेनानी चित्तू पांडेय से मिलने गये। वार्ता और समझौता के क्रम में डीएम जगदीश नारायण निगम ने विधिवत सत्ता का हस्तानांतरण किया गया। इस प्रकार चित्तू पांडेय बलिया के डीएम और पं. महानंद मिश्र पुलिस कप्तान बनाये गये। बलिया में अंग्रेजों के समानांतर सरकार बनी। बीबीसी के हवाले से बलिया 19 अगस्त से 1942 से 23 अगस्त तक आजाद रहा। कही-कही नौ अगस्त 1942 से 23 अगस्त 1942 तक का भी उल्लेख मिलता है। बलिया के साथ बम्बई का सतारा जिला और पं.बंगाल का मेदनापुर जिला भी आजाद हो गये थे।

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यह भनक अंग्रेजों के उच्च अधिकारियों को लगी कि बलिया में अंग्रेजों के समानांतर सरकार है तो अंग्रेज आग बबूला हो गये। प्रतिक्रिया स्वरूप अंग्रेजों ने वाराणसी आजामगढ़ तथा बक्सर से सेना लेकर 24 अगस्त 1942 की रात को बलियावासियों पर दमन चक्र चलाया। जिसमें 84 लोग शहीद हुए थे। चित्तु पांडेय सहित सभी नेता पुनः जेल में डाले गये। द्वितीय विश्व युद्ध दक्षिणी पूर्वी एशिया में अंग्रेजों के पराजय के बाद अंग्रेज निराश हो गये थे। आंदोलन अनवरत चल रहा था। कारवां बढ़ता गया लोग जुड़ते गये। गांधी जी के साथ-साथ गरम दल के नेताजी सुभाषचंद बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, उधम सिंह, अमर शहीद तात्या टोप, महारानी लक्ष्मीबाई जैसे महान क्रांतिकारियों के बदौलत 15 अगस्त 1947 को हमारा देश आजाद हुआ।
शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर वर्ष मेले।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।।

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