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Ballia : भृगु क्षेत्र में गूंज रहा है जय श्रीराम और जय परशुराम

रोशन जायसवाल की एक रिपोर्ट,
बलिया।
लोकसभा बलिया सीट में एनडीए लड़े या इंडिया गठबंधन, यहां एक ही नारा और एक ही नाम, जय श्रीराम और जय परशुराम। भृगु क्षेत्र में भाजपा और सपा प्रत्याशी समर्थकों में एक नया नारा शुरू कर दिया है। वैसे तो भाजपा का जय श्रीराम नारा बहुत पुराना है। लेकिन सपा ने बलिया में एक नया नारा जय परशुराम दिया है। भाजपा प्रत्याशी नीरज शेखर के समर्थक का मोदी के विकास कार्यों का बखान करते हुए जय श्रीराम के नारे लगा रहे है। वहीं सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय के समर्थक जय परशुराम के नारे जोरदार तरीके से लगा रहे है। अब देखना यह होगा कि बलिया का अगला सांसद कौन होता है।

लेकिन बलिया लोकसभा सीट पर लड़ाई बड़ी रोचक दिखायी दे रही है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के छोटे पुत्र नीरज शेखर जहां सरकार की योजनाओं को जन-जन तक पहुंचा रहे है वहीं सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय अखिलेश और मुलायम सरकार में किये गये विकास कार्यों को जनता के बीच गिना रहे है। इस चिलचिलाती धूप में कोई पेड़ के नीचे तो कोई छत के नीचे तो कोई नीले गगन के तले अपने नेता का टेंपो हाई कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ प्रत्याशी जनसंपर्क बनाए हुए हैं। नीरज शेखर झोपड़ी से निकलकर क्षेत्र में दौरा कर रहे है। वहीं सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय जनविश्वास यात्रा लेकर बलिया लोकसभा में घूम रहे है। दोनों तरफ से कड़ी मेहतन की जा रही हैं। जहां नीरज शेखर का यह चौथा चुनाव है वहीं सनातन पांडेय का यह दूसरा चुनाव है। इस रणक्षेत्र में कौन दिल्ली पहुंचा और कौन बलिया में ही रह जाएगा इसका फैसला एक जून को चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चल सकेगा।

समाजवादियों के गढ़ में दो पुराने समाजवादी नेता रणक्षेत्र में
बलिया। नीरज शेखर पुराने समाजवादी चेहरे है और वह 2007, 2009 और 2014 में सपा से चुनाव लड़े। अब 2024 में श्री शेखर भाजपा से चुनाव लड़ रहे है। वहीं सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय एक बार विधायक बने और लगातार कई बार विधानसभा चुनाव लड़े। अब वह दूसरी बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे है।

घोषणा के बाद भी नहीं दिखे बसपा प्रत्याशी
बलिया। बसपा ने बलिया लोकसभा सीट से लल्लन सिंह यादव को चुनाव मैदान में उतार दिया है। जो जनपद गाजीपुर के रहने वाले है। लेकिन अभी तक वे बलिया लोकसभा क्षेत्र में जनता और बसपा कार्यकर्ताओं से नहीं मिल पाये है। यदि यही आलम रहा तो बसपा अपना प्रत्याशी भी बदल सकती है। बसपा के राजनीतिक गलियारे में इसकी चर्चा भी हो रही है।

लगभग 100 किमी की रेंज में है बलिया लोकसभा क्षेत्र
बलिया। वर्ष 2004 के बाद 2009 में नये परिसीमन में गाजीपुर के दो विधानसभा बलिया लोकसभा में शामिल हुआ। जबकि 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी जब अंतिम बार बलिया लोकसभा सीट से चुनाव लड़े तो उस समय बलिया लोकसभा क्षेत्र में बलिया जिले के कुल पांच विधानसभा शामिल था। फेफना, चिलकहर, बलिया, बांसडीह व बैरिया शामिल था। उसके बाद नये परिसीमन में चिलकहर विधानसभा का अस्तित्व समाप्त हो गया। जिसका कुछ हिस्सा फेफना और कुछ हिस्सा रसड़ा विधानसभा शामिल हो गया और बांसडीह विधानसभा क्षेत्र सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र में शामिल हो गया। ऐसे में बलिया के तीन विधानसभा व गाजीपुर के दो विधानसभा मिलाकर बलिया लोकसभा क्षेत्र बना। कहने का मतलब यह है कि बलिया लोकसभा क्षेत्र के नये परिसीमन के बाद यदि बलिया मुख्यालय से लोकसभा की दूरी तय करें तो यहां से लगभग 50 किलोमीटर यूसुफपुर तो वहीं लगभग 50 किमी दूर जयप्रकाश नगर क्षेत्र में पड़ता है। वैसे उत्तर प्रदेश का अंतिम जिला बलिया है और बलिया बिहार से सटा हुआ है। इसलिये बलिया के लोकसभा चुनाव पर बिहारियों की भी नजर रहती है। क्योंकि यह सीट पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के नाम से जानी जाती है।

2019 में नीरज का सपना रह गया अधूरा
बलिया। ऐसा पहली बार हुआ जब 2019 में चंद्रशेखर जी व उनके पुत्र नीरज शेखर के बिना बलिया लोकसभा क्षेत्र सूना रहा। जबकि 1977 से 2004 तक लगातार पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे। हालांकि बीच में यानि की 1980 में चंद्रशेखर जी का विजयरथ रूका और जगन्नाथ चौधरी सांसद बने। उसके बाद लगातार चंद्रशेखर जी ही बलिया के सांसद बने रहे। उनके निधन के बाद 2007 में उपचुनाव हुआ। उसके बाद 2009 और 2014 में सपा से नीरज शेखर चुनाव लड़े लेकिन 2019 में नीरज शेखर का टिकट कटने के बाद चंद्रशेखर और नीरज के बिना बलिया लोकसभा क्षेत्र का चुनाव सूना रहा। लेकिन अब भाजपा ने नीरज शेखर को 2024 में प्रत्याशी बनाकर भेजा हैै।

अब तक के इतिहास में बलिया लोकसभा सीट से किसी महिला को नहीं मिला मौका
बलिया। भले ही हम आधी आबादी की बात कर रहे हो लेकिन राजनीतिक दलों ने महिला उम्मीदवार को अभी तक बलिया लोकसभा सीट से मैदान में नहीं उतारा। जिसके कारण महिलाओं को प्रतिनिधित्व करने का मौका नहीं मिल पाया। हालांकि 2004 में किन्नर उम्मीदवार श्वेता मैदान में उतरी लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। बात करें कांग्रेस की, जनता दल की, समाजवादी जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी या फिर भाजपा की। किसी भी राजनीतिक दल ने महिलाओं को मैदान में नहीं उतारा। महिलाएं वोट करती रही लेकिन चुनाव लड़ने में दूर रही।

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