डा. संतोष यादव के जरिये सपा के एमवाई फैक्टर को बिगाड़ सकती है भाजपा ?

अफजाल के मुकाबले में कौन होगा भाजपा का मजबूत चेहरा
चर्चा, ओबीसी उम्मीदवार पर भी दांव लगा सकती है भाजपा

बलिया से रोशन जायसवाल/ हैदर अली की एक रिपोर्ट
बलिया।
लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और एक जून को गाजीपुर में मतदान भी होना है। ऐसे में अभी तक सपा उम्मीदवार सांसद अफजाल अंसारी के मुकाबले में भाजपा ने अपना पत्ता नहीं खोला है। वैसे चर्चाएं तरह-तरह की हो रही है। भाजपा जातिगत समीकरण को भी लेकर चल रही है। भाजपा के जातिगत समीकरण में ओबीसी उम्मीदवार भी फिट बैठ सकता है। हालांकि यह एक मात्र चर्चा है, लेकिन अभी प्रत्याशी की घोषणा होनी है।

जब तक उम्मीदवार की घोषणा नहीं हो जाती है तब तक ऐसे चर्चाओं का होना आम बात है। गाजीपुर संसदीय क्षेत्र में सिवाय सपा के अब तक न भाजपा और न ही बसपा का उम्मीदवार ही तय है, मगर यह जरूर तय है कि मुख्य मुकाबले के केंद्र में एमवाई (मुस्लिम और यादव वोट) फैक्टर ही रहेगा। जहां सपा इसी एमवाई की किलेबंदी कर अपने मुख्य प्रतिद्वंदी भाजपा को शिकस्त देने की कोशिश करेंगी। वहीं भाजपा सपा के किलेबंदी को भेदकर अपनी जीत की राह बनाने की कोशिश करेगी। गाजीपुर में चुनावी मुकाबले के केंद्र में एमवाई फैक्टर क्यों है, इसका जवाब ऐसे आप समझ सकते है। गाजीपुर में कुल यादव वोटरों की अनुमानित संख्या चार लाख है वहीं मुस्लिम वोटरों की संख्या 1.75 लाख है। 2019 के चुनाव में सपा से गठबंधन के बूते ही बसपा एमवाई समीकरण को साध कर भाजपा को करारी शिकस्त देने में सफल हुई थी और बसपा के उम्मीदवार थे अफजाल अंसारी।

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सपा अफजाल अंसारी के जरिये एमवाई फैक्टर के सहारे सीट को हासिल करना चाहती है। सपा की इस रणनीति की काट में भाजपा कैसी बिसात बिछायेगी। कहा जा सकता है कि भाजपा अपने विकास के मुद्दे को लेकर जनता के बीच लेकर आएगी। यादव, बैकवर्ड को समेटकर सपा को भाजपा करारा जवाब देगी। 2019 के चुनाव में भाजपा के विकास का मुद्दा फेल हो गया था और वर्तमान रेलमंत्री मनोज सिन्हा जीत के करीब नहीं पहुंच पाये। गाजीपुर का इतिहास गवाह है कि जब’-जब एमवाई समीकरण टूटा तब तब भाजपा चुनावी बाजी अपने पक्ष में करती रही। पहली बार 1996, दूसरी बार 1999, तीसरी बार 2014 में भाजपा एमवाई समीकरण तोड़कर ही चुनाव जीती। ये भी कहा जाएगा कि एमवाई फैक्टर टूटने का कारण बसपा के जरिये कहा जाएगा। क्या इस बार भी भाजपा के लिये ऐसा ही मौका बनेगा। वजह यह है कि गाजीपुर में मुस्लिम और यादवों की गोलबंदी ज्यादा मजबूत दिख रही है। इस दशा में शायद बसपा के जरिये मुस्लिम और यादव समीकरण टूटने की गुंजाइश बन सकती है।

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चुनावी विश्लेषकों का यह है मानना
इस मसले पर गाजीपुर के चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम और यादव का समीकरण उसी सूरत में टूट सकता है जब भाजपा किसी यादव को चुनाव में उतारेगी। इसको पुख्ता करने के लिये आजमगढ़ सीट का हवाला दिया है। वहां यादव वोट को अपने पक्ष में लेने के लिये भोजपुरी फिल्म स्टार दिनेश लाल यादव को मैदान में उतारा। आजमगढ में जब भाजपा यादव पर दांव लगायी तब तब भाजपा चुनाव जीतती रही। 2009 में रमाकांत यादव और 2022 के उपचुनाव में दिनेश लाल यादव चुनाव जीते। अब सवाल यह है कि गाजीपुर में यादव चेहरा कौन होगा। जिस पर भाजपा दावं लगा सकती है।

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डा. संतोष यादव की संघ में है जबरदस्त पकड़
चुनावी लिहाज से देखा जाए तो भाजपा में एकमात्र दमदार यादव चेहरा डा. संतोष यादव का है। गाजीपुर संसदीय क्षेत्र के जखनियां और सैदपुर में एक फेमस चेहरा है। 2017 में डा. संतोष यादव बसपा से चुनाव लडे थे और 50000 से अधिक वोट भी पाये थे। संतोष यादव, हमबिरदारी वोट में तोड़फोड़ कर लिये थे। तब माना गया था कि यादव बिरादरी में उनका ठीक ठाक पैठ है। अब सवाल यह उठता है कि भाजपा डा. संतोष यादव के इस ताकत को किस तरह से मानती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी इनको काफी प्राथमिकता मिलती है। इसका अंदाजा ऐसे भी लगाया जा सकता है कि संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत के सिद्धपीठ हथियाराम में दो बार आगमन हुआ और उसका संचालन डा. संतोष यादव ने किया। यहीं नहीं श्री राम जन्मभूमि मंदिर अयोध्या की प्राण प्रतिष्ठा के संपर्क अभियान समिति के जिला सचिव के दायित्व भी डा. संतोष को सौंपी गयी थी। वह सादात के ब्लाक प्रमुख भी है। वह गाजीपुर ब्लाक प्रमुख संघ के संरक्षक भी है। संतोष यादव पंचायत राजनीतिक का बड़ा चेहरा है। संसदीय चुनाव में भाजपा संतोष यादव पर दांव लगायेगी कि नहीं इसका सही जवाब भाजपा का शीर्ष नेतृत्व ही दे सकता है। मगर यह जरूर है कि भाजपा डा. संतोष यादव के बूते सपा के एमवाई फैक्टर को बिगाड़ने की गुंजाइश बना सकती है।

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जब सपा के गढ़ में भाजपा से रमाकांत व निरहुआ जीते चुनाव
आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र सपा का गढ़ माना जाता है। क्योंकि यहां से कभी पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव तो कभी पूर्व मुख्यमंत्री व सपा के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी सांसद रहे है। भाजपा ने यादव वोट में सेंधमारी के लिये 2009 में रमाकांत यादव को चुनाव लड़ाया और इस फार्मूले पर भाजपा को कामयाबी मिली और आजमगढ़ से रमाकांत भाजपा के पहले सांसद बने। उसके बाद 2014 और 2019 के मोदी लहर में भाजपा को यहां से कामयाबी नहीं
मिली। क्योंकि यहां से मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव सपा के सांसद बने। उसके बाद 2022 के उपचुनाव में भाजपा ने दिनेश लाल यादव निरहुआ को मैदान में उतारा और भाजपा को कामयाबी मिली और भाजपा के दूसरे सांसद के रूप में दिनेश लाल यादव सांसद बनें।

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